Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
महापुरुष · पृष्ठ 164
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1भक्त भगवान में तो गोविंद राधे।
2जब जब होती है होड़ बता दे॥ 1872॥
3तब तब भगवान गोविंद राधे।
4भक्त सुखहित हार मानें बता दे॥ 1873॥
5हरि रूठ जाये जो तो गोविंद राधे।
6हरिभक्त ही है ऐसा क्षमा करवा दे।। 1874॥
7हरिभक्त रूठे जो तो गोविंद राधे।
8कोई शक्ति ऐसी नहिं क्षमा करवा दे॥ 1875॥
9गुरु यदि रूठ जाये गोविंद राधे।
10कोटि करो भक्ति हरि अँगुठा दिखा दे॥ 1876॥
11हरि ढिग पाप करे गोविंद राधे।
12गुरु को है अधिकार वाय क्षमा दे॥ 1877॥
13गुरु ढिग पाप करे गोविंद राधे।
14हरि ना क्षमा करे गुरु ही क्षमा दे॥ 1878॥
15पाप क्षमा होय जब गोविंद राधे।
16पुनि पाप करे न प्रमाण बता दे॥ 1879॥
17बार बार क्षमा माँगे गोविंद राधे।
18बार बार पाप करे कैसे क्षमा दे॥ 1880॥
19मन ते तो पाप करे गोविंद राधे।
20मुख ते क्षमा माँगे कैसे क्षमा दे॥ 1881॥
21गुरु जापै कृपा करे गोविंद राधे।
22वाके पाछे हरि चलें सब को बता दे॥ 1882॥
23हरि ते मिलावे गुरु गोविंद राधे।
24ऐसे गुरु ते ही तू मन को मिला दे॥ 1883॥