Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
महापुरुष · पृष्ठ 163
Reading 175 of 516 · Source nos. 1860–1871 · Source PDF 180
1हरि तो है बुद्धि पर गोविंद राधे।
2गुरु ही कृपा करि हरि को जना दे॥ 1860॥
3बिगरी बना दे गुरु गोविंद राधे।
4हरि लीला बनी को भी बिगरी करा दे॥ 1861॥
5गुरु की कृपा बिनु गोविंद राधे।
6कोटि साधन करो हरि कछु ना दे॥ 1862॥
7गुरु जो प्रसन्न हो तो गोविंद राधे।
8हरि हों प्रसन्न बिनु भक्ति बता दे॥ 1863॥
9गुरु तो बना दे सब गोविंद राधे।
10गुरु बिनु हरि लाल झण्डी दिखा दे॥ 1864॥
11गुरु की शरण गहो गोविंद राधे।
12गुरु की मुट्ठी में हरि हैं बता दे॥ 1865॥
13जग शासक कृष्ण गोविंद राधे।
14कृष्ण शासक कृष्ण भक्त है बता दे॥ 1866॥
15हरि भक्ति सर्वश्रेष्ठ गोविंद राधे।
16वाते भी श्रेष्ठ गुरु भक्ति बता दे॥ 1867॥
17हरि कह ऊधो मेरी गोविंद राधे।
18पूजा ते श्रेष्ठ गुरुपूजा बता दे॥ 1868॥
19गुरु पाछे हरि चले गोविंद राधे।
20गुरु पदरज उड़ि पावन बना दे॥ 1869॥
21न तो हरि सम कोउ गोविंद राधे।
22न तो है अधिक कोउ वेद बता दे॥ 1870॥
23किन्तु हरिभक्त भक्ति गोविंद राधे।
24हरि को भी भक्तों ते छोटा बना दे॥ 1871॥