Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
महापुरुष · पृष्ठ 162
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1संत ही आत्मा है गोविंद राधे।
2संत ही है भगवत्स्वरूप बता दे॥ 1848॥
3गुरु मन शुद्ध करे गोविंद राधे।
4शुद्ध करि वाको पुनि हरि को दिला दे॥ 1849॥
5गुरु तो है माता सम गोविंद राधे।
6शिशु मन मल धोके विमल बना दे॥ 1850॥
7गुरु माता शिशु मन गोविंद राधे।
8बिमल बना के हरि गोद बिठा दे॥ 1851॥
9गुरु तो है पिता सम गोविंद राधे।
10कन्या को सजा के हरि घर पहुँचा दे॥ 1852॥
11दाता हैं झूठे दोऊ गोविंद राधे।
12गुरु प्रेमदान करे दोनों प्रेम ना दें॥ 1853॥
13दोनों हैं प्रेम-सिन्धु गोविंद राधे।
14किन्तु प्रेम दे ना सकें जन ते दिला दें॥ 1854॥
15दोउ पुष्प वाटिका हैं गोविंद राधे।
16भक्त जन वायु बनि जग महका दें॥ 1855॥
17दोउ समुद्र सम गोविंद राधे।
18भक्तजन घन ब्रजरस बरसा दें॥ 1856॥
19हरि चौर्य कर्म को गोविंद राधे।
20करे जो प्रकट वाय जग ते हटा दे॥ 1857॥
21हरि जार कर्म को गोविंद राधे।
22करे जो प्रकट वाय जग ते हटा दे॥ 1858॥
23जग ते हटा दे अर्थ गोविंद राधे।
24निन्दा ना करे गोलोक दिला दे॥ 1859॥