Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
महापुरुष · पृष्ठ 161
Reading 173 of 516 · Source nos. 1836–1847 · Source PDF 178
1गुरु ते मिलावे हरि गोविंद राधे।
2हरि ते मिलावे गुरु तत्व बता दे॥ 1836॥
3हरि गुरु दोनों मेरे गोविंद राधे।
4प्रमुख है गुरु पता हरि का बता दे॥ 1837॥
5हरि ते भी बड़ा गुरु गोविंद राधे।
6गुरु प्रेमदान करे हरि प्रेम ना दे॥ 1838॥
7हरि साथी बने का है गोविंद राधे।
8गुरु साथी बिगरे का बिगरी बना दे॥ 1839॥
9हरि शुद्ध मन माँगे गोविंद राधे।
10गुरु ज्ञान दै के मन शुद्ध करा दे॥ 1840॥
11हरि गुरु एक किन्तु गोविंद राधे।
12गुरु मन शुद्ध करे प्रेमसुधा दे॥ 1841॥
13हरि गुरु एक किन्तु गोविंद राधे।
14गुरु की कृपा हो तो हरि ते मिला दे॥ 1842॥
15मायाधीन मायाधीश गोविंद राधे।
16दोनों दास मायातीत के बता दे॥ 1843॥
17गुरु की कृपा जो होवे गोविंद राधे।
18भाजे आवें श्यामा श्याम गलबँहियाँ दे॥ 1844॥
19सूर्य के उदय पै गोविंद राधे।
20ज्यों जग वस्तुयें दीखें बता दे॥ 1845॥
21वैसे ही संत जन गोविंद राधे।
22दिव्य दृष्टि दै के हरि को दिखला दे॥ 1846॥
23संत ही सच्चा देव गोविंद राधे।
24संत ही सच्चा स्वजन है बता दे॥ 1847॥