Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
महापुरुष · पृष्ठ 160
Reading 172 of 516 · Source nos. 1824–1835 · Source PDF 177
1हरि गुरु गंगा सम गोविंद राधे।
2उनमें ही एक हो जा गंगा बना दे॥ 1824॥
3प्रिय यदि शुद्ध हो तो गोविंद राधे।
4प्रेमी अशुद्ध को भी शुद्ध बना दे॥ 1825॥
5हरि गुरु दोनों शुद्ध गोविंद राधे।
6शुद्ध ते अशुद्ध मिलि शुद्ध हो बता दे॥ 1826॥
7हरि गुरु दोनों शुद्ध गोविंद राधे।
8हरि गुरु प्रेम मन शुद्ध करा दे॥ 1827॥
9जग है असार जामें गोविंद राधे।
10हरि गुरु में ही प्यार सार बता दे॥ 1828॥
11हरि गुरु एक मान गोविंद राधे।
12करु निष्काम भक्ति काम बना दे॥ 1829॥
13“यस्य देवे” मंत्र कहे गोविंद राधे।
14हरि गुरुभक्ति एक सी हो बता दे॥ 1830॥
15जैसा भाव हरि में हो गोविंद राधे।
16वैसा भाव गुरु में भी वेद बता दे॥ 1831॥
17हरि गुरु दोनों एक गोविंद राधे।
18पिता मातापति जैसे एक बता दे॥ 1832॥
19हरि कहे गुरु बड़ो गोविंद राधे।
20गुरु कहे हरि बड़ो दोउ धोखा दे॥ 1833॥
21हरि में हैं हरि गुरु गोविंद राधे।
22गुरु में हैं हरि गुरु सबको बता दे॥ 1834॥
23हरि कृपा गुरु मिले गोविंद राधे।
24गुरु कृपा हरि मिले सब को बता दे॥ 1835॥