Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
महापुरुष · पृष्ठ 158
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1प्राणियों की दो सृष्टि गोविंद राधे।
2एक दैव एक है आसुर बता दे॥ 1800॥
3कृष्ण की भक्तियुक्त गोविंद राधे।
4दैव सृष्टि वाला जानो बता दे॥ 1801॥
5कृष्ण के विमुख जो है गोविंद राधे।
6आसुर सृष्टि वाला जानो बता दे॥ 1802॥
7खल मिलि दुःख देत गोविंद राधे।
8सन्त बिछुरि दुख देत बता दे॥ 1803॥
9नारियल सम सन्त गोविंद राधे।
10बाहर कठोर भीतर मधुर बता दे॥ 1804॥
11बेर फल सम खल गोविंद राधे।
12भीतर कठोर बाहर मधुर बता दे॥ 1805॥
13खलमुख पद्मदल गोविंद राधे।
14वाणी मधुर उर कैंची बता दे॥ 1806॥
15गुरु हरि का ही रूप गोविंद राधे।
16जानो अरु मानो अरु औरों को जना दे॥ 1807॥
17जाने का अर्थ माने गोविंद राधे।
18माने का अर्थ क्रिया रूप दे बता दे॥ 1808॥
19जाना तो अनंत बार गोविंद राधे।
20माना नहिं हेतु महापाप बता दे॥ 1809॥
21पापों ते मलिन मन गोविंद राधे।
22वेद गुरु वचनों में शंका करा दे॥ 1810॥
23भव रोग वैद्य वेद गोविंद राधे।
24वेद ज्ञान गुरु ते गुरु वैद्य बता दे॥ 1811॥