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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

महापुरुष · पृष्ठ 157

Reading 169 of 516 · Source nos. 1788–1799 · Source PDF 174

1वृक्ष फल खाये नहिं गोविंद राधे।

2जग को खिलाये उपकार बता दे॥ 1788॥

3पर उपकार ही है गोविंद राधे।

4सन्तों का सहज स्वभाव बता दे॥ 1789॥

5पर अपकार ही है गोविंद राधे।

6दुष्टों का सहज स्वभाव बता दे॥ 1790॥

7खल बिनु स्वारथ गोविंद राधे।

8पर अपकार करे अहि ज्यों बता दे॥ 1791॥

9भोज पत्र सम सन्त गोविंद राधे।

10पर हित निज सर्वस्व लुटा दे॥ 1792॥

11निज परिताप ते गोविंद राधे।

12पिघले उसे नवनीत बता दे॥ 1793॥

13पर परिताप ते गोविंद राधे।

14पिघले उसे भक्तहृदय बता दे॥ 1794॥

15जीवदया हरिभक्ति गोविंद राधे।

16भक्त भक्ति तीन कर्म भक्त के बता दे॥ 1795॥

17स्वार्थ तजि जो कर गोविंद राधे।

18पर उपकार महामानव बता दे॥ 1796॥

19स्वार्थ साथ जो कर गोविंद राधे।

20पर उपकार वाय मानव बता दे॥ 1797॥

21स्वार्थ हित जो कर गोविंद राधे।

22पर अपकार वाय असुर बता दे॥ 1798॥

23कर जो निरर्थक गोविंद राधे।

24पर अपकार अधमाधम बता दे॥ 1799॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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