Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
महापुरुष · पृष्ठ 156
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1गुरु ते ही हरिज्ञान गोविंद राधे।
2गुरु बिनु क, ख, ग, घ, ज्ञान ना बता दे॥ 1776॥
3श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गोविंद राधे।
4गुरु ही ईश्वरीय ज्ञान करा दे॥ 1777॥
5भागवत आदि का भी गोविंद राधे ।
6ज्ञान ब्रह्मनिष्ठ गुरु ते हो बता दे॥ 1778॥
7केवल शब्दज्ञानी गोविंद राधे।
8कोरा उपदेश ही दे दिव्य प्रेम ना दे॥ 1779॥
9जैसे दीप की लौ गोविंद राधे।
10दे प्रकाश नीचे हो अंधेरा बता दे॥ 1780॥
11ऐसे शब्द ज्ञानी भी गोविंद राधे।
12ज्ञान दे आपु रहे कोरा बता दे॥ 1781॥
13शास्त्रानभिज्ञ जन गोविंद राधे।
14विरक्त भी ज्ञान दे ना बता दे॥ 1782॥
15गुरु वेदवित हो गोविंद राधे।
16दिव्य प्रेमयुक्त भी हो हरि ते मिला दे॥ 1783॥
17पुण्यपुंज हरि कृपा गोविंद राधे।
18संत मिले सत्संग बिगरी बना दे॥ 1784॥
19प्रेम सम साध्य नहिं गोविंद राधे।
20सद्गुरु सम न हितैषी बता दे॥ 1785॥
21पाप ते बचावे अरु गोविंद राधे।
22हरि में लगावे सो हितैषी बता दे॥ 1786॥
23नदी जल पीवे नहिं गोविंद राधे।
24जग को पिलावे उपकार बता दे॥ 1787॥