Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संसार · पृष्ठ 153
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1जग राग नाम राग गोविंद राधे।
2हरि राग नाम अनुराग बता दे॥ 1747॥
3हीरा ते हीरा कटे गोविंद राधे।
4हरि प्रेम ते जग प्रेम मिटा दे॥ 1748॥
5जग ममता मिटे जो गोविंद राधे।
6हरि गुरु के प्रति ममता बढ़ा दे॥ 1749॥
7विषयों में चित्त तो हो गोविंद राधे।
8कर्कश हरि में हो मृदुल बता दे॥ 1750॥
9चित्त ही है संसार गोविंद राधे।
10याते भक्ति ते चित्त शुद्ध करा दे॥ 1751॥
11जितनी हो भक्ति मन गोविंद राधे।
12उतना ही सहज विराग मन ला दे॥ 1752॥
13हरि में लगे ना मन गोविंद राधे।
14मन प्रत्यक्ष में ही लगता बता दे॥ 1753॥
15हरि है परोक्ष किन्तु गोविंद राधे।
16जग प्रत्यक्ष याते मन को लुभा दे॥ 1754॥
17हरि है विजातीय गोविंद राधे।
18जग है सजातीय मन को लुभा दे॥ 1755॥
19सारा दोष बुद्धि का है गोविंद राधे।
20बुद्धि जैसा चाहे वैसा मन ते करा दे॥ 1756॥
21हरि में लगे ना मन गोविंद राधे।
22मन जग में लग चुका है बता दे॥ 1757॥
23हरि में लगे ना मन गोविंद राधे।
24मन लग जाना तो सिद्धि है बता दे॥ 1758॥