Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संसार · पृष्ठ 152
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1हरि ही सों प्यार करो गोविंद राधे।
2जग ते न प्यार न तो खार करा दे॥ 1735॥
3मन मन्दिर एक गोविंद राधे।
4हरि को बिठा दे चाहे जग को बिठा दे॥ 1736॥
5हरि कह कहाँ आऊँ गोविंद राधे।
6मन मन्दिर मेरा स्वच्छ करा दे॥ 1737॥
7उर में बसाया जग गोविंद राधे।
8हरि आवें भी तो कहाँ बैठें बता दे॥ 1738॥
9सब बैठे भीतर गोविंद राधे।
10नन्दलाल बैठे हैं बाहर बता दे॥ 1739॥
11हरि को बुलाने के गोविंद राधे।
12पूर्व उर के सब जग को भगा दे॥ 1740॥
13जग में लगा है मन गोविंद राधे।
14जग ते हटाने में श्रम है बता दे॥ 1741॥
15जग ते हटे ना मन गोविंद राधे।
16कारण अनादि आसक्ति बता दे॥ 1742॥
17जग ते हटे ना मन गोविंद राधे।
18जग सुख मिथ्या पूर्व बुद्धि में बिठा दे॥ 1743॥
19जग ते हटे ना मन गोविंद राधे।
20हटे तब जब जग रूप बता दे॥ 1744॥
21जग ते हटे ना मन गोविंद राधे।
22मन क्षण को न अकर्ता बता दे॥ 1745॥
23राग ते राग हटे गोविंद राधे।
24हरि राग ते जग राग हटा दे॥ 1746॥