Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संसार · पृष्ठ 151
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1प्रेम यदि जग ते जुड़े गोविंद राधे।
2जीव को सदा मिले दुख ही बता दे॥ 1723॥
3प्रेम यदि हरि ते जुड़े गोविंद राधे।
4सदा सर्वत्र मिले सुख ही बता दे॥ 1724॥
5प्रेम करना तो है गोविंद राधे।
6प्राणीमात्र का स्वभाव बता दे॥ 1725॥
7क्षेत्र भी दो ही हैं गोविंद राधे।
8इक मायिक इक दिव्य बता दे॥ 1726॥
9मायिक प्रेम फल गोविंद राधे।
10मायिक ही मिलता है बता दे॥ 1727॥
11हरि का तो प्रेम फल गोविंद राधे।
12हरि का ज्ञान आनन्द दिला दे॥ 1728॥
13सब कछु हरि का है गोविंद राधे।
14यह मेरा यह तेरा मन ते हटा दे॥ 1729॥
15मेरा तेरा जनि छोड़ो गोविंद राधे।
16मेरा श्याम श्याम का मैं और लगा दे॥ 1730॥
17मैं मेरा जनि छोड़ो गोविंद राधे।
18दास और स्वामी वाके आगे लगा दे॥ 1731॥
19मेरा मेरा जनि तजु गोविंद राधे।
20मेरा शब्द आगे हरि गुरु भी लगा दे॥ 1732॥
21मेरा हरि भी है माना गोविंद राधे।
22हरि ही है मेरा मन ते मनवा दे॥ 1733॥
23हरि ही हैं तेरे यह गोविंद राधे।
24सच तब जब मन जग ते हटा दे॥ 1734॥