Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संसार · पृष्ठ 150
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1जग नाते तनु के हैं गोविंद राधे।
2तनु छूटे नाते टूटे कोउ साथ ना दे॥ 1711॥
3अब जाना साँचो मीत गोविंद राधे।
4साँचो मीत उर ला दे काँचो भुला दे॥ 1712॥
5सुत पति बनितादि गोविंद राधे।
6तेरे ना तो हैं ना तो होंगे बता दे॥ 1713॥
7मेरा तू है सब कहें गोविंद राधे।
8स्वार्थ ना सधे तो पूछे कौन तू बता दे॥ 1714॥
9अपना बनाया जिसको गोविंद राधे।
10बुद्धू बनाया उसने निज स्वार्थ साधे॥ 1715॥
11किन्तु हरि का द्वार गोविंद राधे।
12पतितन हित सदा खुला है बता दे॥ 1716॥
13हरि तो विरोधी को भी गोविंद राधे।
14अन्न, जल, वायु सब कछु दे बता दे॥ 1717॥
15जग तो विरोधी को गोविंद राधे।
16दे नहिं क छु सब छीन ले बता दे॥ 1718॥
17जब लौं जो अनुकूल गोविंद राधे।
18तब लौं सो सब को ही प्रिय है बता दे॥ 1719॥
19जब हो जो प्रतिकूल गोविंद राधे।
20तब सोइ वाको हो द्वेष्य बता दे॥ 1720॥
21बार बार मार खा के गोविंद राधे।
22रोटी दिखा दे कुत्ता पूँछ को हिला दे॥ 1721॥
23ऐसे जग वालों ने गोविंद राधे।
24बार बार तोहिं सताया तू भुला दे॥ 1722॥