Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संसार · पृष्ठ 149
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1हरि कहे तू मेरा गोविंद राधे।
2जग कहे तू मेरा सच क्या बता दे॥ 1699॥
3आत्मा तो हरि का है गोविंद राधे।
4देह जग का है यह जग को बता दे॥ 1700॥
5तनु हित जग रचा गोविंद राधे।
6भोला भाला मन वामें सक्त करा दे॥ 1701॥
7मलयुक्त जल सों ज्यों गोविंद राधे।
8मैला वस्त्र धोये और मैला बना दे॥ 1702॥
9ऐसे अशुद्ध मन गोविंद राधे।
10जग में लगाये और मलिन बना दे॥ 1703॥
11हरि ने बनाया जग गोविंद राधे।
12तन के लिए मन हरि में लगा दे॥ 1704॥
13सारा जग तनु हित गोविंद राधे।
14जीव हित हरि गुरु दो हैं बता दे॥ 1705॥
15साँचो नातेदार सोई गोविंद राधे।
16जो जीव का नाता हरि ते जुड़ा दे॥ 1706॥
17सोइ मात पिता साँचो गोविंद राधे।
18जो सुत को हरिभक्त बना दे॥ 1707॥
19जो मात पिता आदि गोविंद राधे।
20भक्ति में बाधा डारे त्याग करा दे॥ 1708॥
21अगनित माता पिता गोविंद राधे।
22बने साँचे माता पिता हरि को भुला दे॥ 1709॥
23अगनित सुत सुता गोविंद राधे।
24बने वे कहाँ हैं कोई पता ही बता दे॥ 1710॥