Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संसार · पृष्ठ 148
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1सारा जग कृष्णधाम गोविंद राधे।
2क्योंकि कृष्ण जग में हैं व्याप्त बता दे॥ 1687॥
3मायालोक गोलोक गोविंद राधे।
4कृष्ण प्रेम बिनु सब सम हैं बता दे॥ 1688॥
5हरि का जो प्रेम मिले गोविंद राधे।
6इस जग को हरि रूप बना दे॥ 1689॥
7जल मिले दूध में ते गोविंद राधे।
8हंस दूध पी ले जल पृथक् बहा दे॥ 1690॥
9ऐसे हरि उर धरु गोविंद राधे।
10मायिक आसक्ति उर ते हटा दे॥ 1691॥
11बिहार आहार गोविंद राधे।
12युक्त हो तो भक्ति की साधना करा दे॥ 1692॥
13जन्म ते मृत्यु लौं गोविंद राधे।
14युक्त आहार विहार करा दे॥ 1693॥
15अन्यथा तनु रोगी हो गोविंद राधे।
16पुनि हो साधना में बाधा बता दे॥ 1694॥
17“पश्वादिभिः” सूत्र गोविंद राधे।
18ब्रह्मलीन को भी भूख प्यास बता दे॥ 1695॥
19भूख प्यास ज्ञानी को भी गोविंद राधे।
20जिसकी हो पूर्ति संसार ते बता दे॥ 1696॥
21ब्रह्म ज्ञान होने पै भी गोविंद राधे।
22जगत प्रपंच था, है, रहेगा बता दे॥ 1697॥
23हरि कह तू है मेरा गोविंद राधे।
24किन्तु मैं हूँ मेरा मेरा अनुभव बता दे॥ 1698॥