Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संसार · पृष्ठ 147
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1राग तो है ही राग गोविंद राधे।
2जगत का द्वेष भी है राग बता दे॥ 1675॥
3द्वेष करने ते तो गोविंद राधे।
4मन शत्रु के पास जायेगा बता दे॥ 1676॥
5द्वेष आग मन काष्ठ गोविंद राधे।
6आग ते काष्ठ ही तो जलेगा बता दे॥ 1677॥
7बार बार चिन्तन गोविंद राधे।
8प्रेम अथवा द्वेष को भी बढ़ा दे॥ 1678॥
9राग द्वेष दोनों जब गोविंद राधे।
10जग में न हों मन खाली हो बता दे॥ 1679॥
11शोक करने ते तो गोविंद राधे।
12मन भूतकाल में जायेगा बता दे॥ 1680॥
13चिता तो जलावे शव गोविंद राधे।
14चिन्ता जलावे जीवित को बता दे॥ 1681॥
15जग में हैं हरि माया गोविंद राधे।
16हरि में लगा दे मन माया ते हटा दे॥ 1682॥
17हरि में लगा दे मन गोविंद राधे।
18जग ते हटा दे मन जग तोहिं का दे॥ 1683॥
19जग ते हटा दे मन गोविंद राधे।
20श्याम मिलन व्याकुलता बढ़ा दे॥ 1684॥
21हरि ही में जग लखु गोविंद राधे।
22जग में ही हरि लखु काम बना दे॥ 1685॥
23सारा जग मायाधाम गोविंद राधे।
24कृष्ण प्रेम हो तो हरिधाम बना दे॥ 1686॥