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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

संसार · पृष्ठ 146

Reading 158 of 516 · Source nos. 1663–1674 · Source PDF 163

1जग यदि होता ना तो गोविंद राधे।

2हरि गुन लीला धाम पाते ना बता दे॥ 1663॥

3जग को न तज मन गोविंद राधे।

4जग में न सुख यह मन में बिठा दे॥ 1664॥

5जग में रहो ऐसे गोविंद राधे।

6धर्मशाला में यात्री रहें ज्यों बता दे॥ 1665॥

7धर्मशाला को ही गोविंद राधे।

8निज घर मान लेना मूर्खता बता दे॥ 1666॥

9ऐसे ही जग को भी गोविंद राधे।

10अपना मान लेना है मूर्खता बता दे॥ 1667॥

11जग में रहो ऐसे गोविंद राधे।

12पद्म दल पै जल रहे ज्यों बता दे॥ 1668॥

13जग में रहो ऐसे गोविंद राधे।

14तन ते हो कर्म मन हरि में लगा दे॥ 1669॥

15जग में रहो ऐसे गोविंद राधे।

16गाय घास चरे बछड़ा ना भुला दे॥ 1670॥

17जग में रहो ऐसे गोविंद राधे।

18जल में रहे माखन ज्यों बता दे॥ 1671॥

19जग में रहो ऐसे गोविंद राधे।

20नाटक में ज्यों कोई पात्र बता दे॥ 1672॥

21जग में रहो ऐसे गोविंद राधे।

22ना हो शत्रु कोई ना ही मित्र बता दे॥ 1673॥

23जग में रहो ऐसे गोविंद राधे।

24राग द्वेष ना हो अभिनय ही करा दे॥ 1674॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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