Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संसार · पृष्ठ 145
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1पुनि हरि व्यापक गोविंद राधे।
2जग में मिले काहे सुख ना बता दे॥ 1651॥
3पित्त रोगी रसना को गोविंद राधे।
4मीठी मिश्री लगे कड़ुवी बता दे॥ 1652॥
5ऐसे माया रोगी को गोविंद राधे।
6जग व्याप्त कृष्ण रस मिले ना बता दे॥ 1653॥
7हरि में है जग अरु गोविंद राधे।
8जग में है हरि दोनों सत्य बता दे॥ 1654॥
9हरि के अधीन जग गोविंद राधे।
10जग के अधीन हरि नाहिं बता दे॥ 1655॥
11जग तो है नश्वर गोविंद राधे।
12हरि नित्य अविनाशी हैं बता दे॥ 1656॥
13हरि बिनु जग नहिं गोविंद राधे।
14जग बिनु हरि थे हैं रहेंगे बता दे॥ 1657॥
15सूत बिना वस्त्र नहिं गोविंद राधे।
16ऐसे ही कृष्ण बिना जग ना बता दे॥ 1658॥
17वस्त्र बिनु सूत रहे गोविंद राधे।
18ऐसे जग बिनु रहें कृष्ण बता दे॥ 1659॥
19हरि जग सम्बन्ध गोविंद राधे।
20ऐसा है सातों विभक्ति बता दे॥ 1660॥
21जग को न कोसो कोई गोविंद राधे।
22जग की दसों दिशा में हरि को बिठा दे॥ 1661॥
23जग को न कोसो जग गोविंद राधे।
24तनु हित तनु ही तो भजन करा दे॥ 1662॥