Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संसार · पृष्ठ 144
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1अब ना बनाऊँ कहे गोविंद राधे।
2पुनि भूले पुनि नई कामना बना दे॥ 1639॥
3कामना अपूर्ति में गोविंद राधे।
4क्रोध तुरत उत्पन्न हो बता दे॥ 1640॥
5इच्छाओं को मारो जनि गोविंद राधे।
6हरि गुरु सेवा इच्छा और बढ़ा दे॥ 1641॥
7बार बार सोचो सुख गोविंद राधे।
8हरि ही में हरि ही में सक्त करा दे॥ 1642॥
9हरि में ही सुख का गोविंद राधे।
10बार बार चिन्तन हरि प्रेम करा दे॥ 1643॥
11बार बार सोचो यह गोविंद राधे।
12हरि ही है हरि ही है मेरा बता दे॥ 1644॥
13बार बार सोचो यह गोविंद राधे।
14जग भौतिक तनु हेतु है बता दे॥ 1645॥
15“मैं” का विषय हरि गोविंद राधे।
16तनु का विषय सारा जग है बता दे॥ 1646॥
17नासा सूँघे देखे नहिं गोविंद राधे।
18नैन सूँघे नहिं दोनों भौतिक बता दे॥ 1647॥
19ऐसे दिव्य जीव का हो गोविंद राधे।
20भौतिक जग कैसे विषय बता दे॥ 1648॥
21जग में भी रहें हरि गोविंद राधे।
22याते जग को भी हरि धाम बता दे॥ 1649॥
23लोग कहें पानी में गोविंद राधे।
24डारा सिता तो लगे मीठा बता दे॥ 1650॥