Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संसार · पृष्ठ 143
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1जीव कल्याण हित गोविंद राधे।
2जग रचा जीव यामें मन को लगा दे॥ 1627॥
3राम नाम सत्य बोले गोविंद राधे।
4घर लौटते ही जग सत्य बता दे॥ 1628॥
5हरि की कथा ना सुने गोविंद राधे।
6ग्राम्य कथा में मन मगन करा दे॥ 1629॥
7बार बार जामें सुख गोविंद राधे।
8मानो मन वामें आसक्त करा दे॥ 1630॥
9जामें हो आसक्ति गोविंद राधे।
10वाकी कामना मन पैदा करा दे॥ 1631॥
11कामना की पूर्ति में गोविंद राधे।
12छिन छिन मन महँ लोभ बढ़ा दे॥ 1632॥
13आग की ज्वाला में गोविंद राधे।
14जितना भी घृत डालो आग बढ़ा दे॥ 1633॥
15ऐसे ही जितना भी गोविंद राधे।
16जग मिले उतना ही लोभ बढ़ा दे॥ 1634॥
17नर चाहे सुर पद गोविंद राधे।
18सुर सब चाहें मोहिं इन्द्र बना दे॥ 1635॥
19इन्द्र भी मायाबद्ध गोविंद राधे।
20वह चाहे ब्रह्मा का पद दिलवा दे॥ 1636॥
21जग ते बड़ा है हरि गोविंद राधे।
22हरि ते बड़ी है तृष्णा अन्त ना बता दे॥ 1637॥
23भोग तृष्णा को ज्यों ज्यों गोविंद राधे।
24भोजन मिले भूख और बढ़ा दे॥ 1638॥