Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संसार · पृष्ठ 142
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1सदा हरि स्मरण गोविंद राधे।
2करे तो गृहस्थ गोलोक बना दे॥ 1615॥
3संपत्ति हरि स्मरण गोविंद राधे।
4विपत्ति है हरि विस्मरण बता दे॥ 1616॥
5हरि को भुलाया जो गोविंद राधे।
6माया को बुलाया यह सिद्ध बता दे॥ 1617॥
7गृहासक्त जाने नहिं गोविंद राधे।
8“हम कौन”, “कौन हमारा” बता दे॥ 1618॥
9गृहासक्त जाने नहिं गोविंद राधे।
10लक्ष्य हमारा सुख कहाँ है बता दे॥ 1619॥
11गृहासक्त जाने नहिं गोविंद राधे।
12कृष्ण ते मेरा संबंध क्या बता दे॥ 1620॥
13गृहासक्त जाने नहिं गोविंद राधे।
14हरि माया जाय कैसे बता दे॥ 1621॥
15गृहासक्त जाने नहिं गोविंद राधे।
16कृष्ण प्रेम कैसे कहाँ मिलेगा बता दे॥ 1622॥
17गृहासक्त जाने नहिं गोविंद राधे।
18निज लक्ष्य आनन्द, ढूँढ़े बता दे॥ 1623॥
19ढूँढ़ते ढूँढ़ते गोविंद राधे।
20बीत गये अगनित जन्म बता दे॥ 1624॥
21जब कभु सन्त मिले गोविंद राधे।
22तब ही सत्य तत्वज्ञान हो बता दे॥ 1625॥
23तब नित्य सत्संग गोविंद राधे।
24द्वारा जीव कृतार्थ हो बता दे॥ 1626॥