Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संसार · पृष्ठ 154
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1जग ते हटाना मन गोविंद राधे।
2हरि में लगाना मन साधना बता दे॥ 1759॥
3हरि में लगावो मन गोविंद राधे।
4बार बार पाछे आपु लगेगा बता दे॥ 1760॥
5हटाने लगाने का गोविंद राधे।
6नाम विराग अभ्यास बता दे॥ 1761॥
7अभ्यास ते ही मन गोविंद राधे।
8जग में लगा था मिला दुःख बता दे॥ 1762॥
9जग में तो सुख नहिं गोविंद राधे।
10तो भी मन लग गया अचरज बता दे॥ 1763॥
11हरि तो आनन्दसिन्धु गोविंद राधे।
12वहाँ तो मिलेगा आनन्द बता दे॥ 1764॥
13ओरे मोरे मूढ़ मन! गोविंद राधे।
14राधा रमन में रम न क्यों बता दे॥ 1765॥
15ओरे मोरे मूढ़ मन! गोविंद राधे।
16राधा रमन गुन गा ना क्यों बता दे॥ 1766॥
17ओरे मोरे मूढ़ मन! गोविंद राधे।
18जग सपना जाग ना क्यों बता दे॥ 1767॥
19ओरे मोरे मूढ़ मन! गोविंद राधे।
20जग तन का अपना ना बता दे॥ 1768॥
21ओरे मोरे मूढ़ मन! गोविंद राधे।
22हरि अपना अपना ना क्यों बता दे॥ 1769॥