Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संसार · पृष्ठ 138
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1कुसंस्कार वश गोविंद राधे।
2मायिक विषयों में सक्त बता दे॥ 1567॥
3इन्द्रियों ते मन मिला गोविंद राधे।
4मन ते मिली बुद्धि पतन करा दे॥ 1568॥
5कामना तो इन्द्रिय मन गोविंद राधे।
6प्राण, धर्म, धृति, मति स्मृति को नसा दे॥ 1569॥
7शरीर शीर्ण शील गोविंद राधे।
8किन्तु विषय तृष्णा तरु ण हो बता दे॥ 1570॥
9विषयों के भोग ऐसे गोविंद राधे।
10अग्नि ज्वाला में घृत धार ज्यों बता दे॥ 1571॥
11शूकर को विष्ठा ते गोविंद राधे।
12जैसे प्रेम है अत्यधिक बता दे॥ 1572॥
13वैसे ही विषयी को गोविंद राधे।
14विषयों में है प्रेम अधिक बता दे॥ 1573॥
15संतोषी ही धनी है गोविंद राधे।
16तृष्णा युक्त इन्द्र भी दरिद्र बता दे॥ 1574॥
17अध्यात्म अधिभूत गोविंद राधे।
18अधिदेव हैं तीन ताप बता दे॥ 1575॥
19आध्यात्मिक ताप गोविंद राधे।
20शारीर मानस दो हैं बता दे॥ 1576॥
21वात, पित्त, कफ जन्य गोविंद राधे।
22ज्वर आदि रोग शारीर हैं बता दे॥ 1577॥
23काम, क्रोध, लोभ आदि गोविंद राधे।
24मन सम्बन्धी रोग मानस बता दे॥ 1578॥