Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संसार · पृष्ठ 137
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1एक एक विषय की गोविंद राधे।
2अगणित वस्तु जग मन को लुभा दे॥ 1555॥
3व्याध वादन ते तो गोविंद राधे।
4मुग्ध हिरन निज प्राण गमा दे॥ 1556॥
5दीपक लौ पै गोविंद राधे।
6बैठ कर पतंग निज प्राण गमा दे॥ 1557॥
7भृंग पतंग मीन गोविंद राधे।
8एक ही विषय ते तनु त्यागें बता दे॥ 1558॥
9कुरंग मातंग गोविंद राधे।
10एक ही विषय ते तनु त्यागें बता दे॥ 1559॥
11नर के तो पाँच विषय गोविंद राधे।
12याते विनाश में ना संशय बता दे॥ 1560॥
13जीव को बुलावे हरि गोविंद राधे।
14मार्ग में जग उपवन भी लगा दे॥ 1561॥
15जीव उपवन में ही गोविंद राधे।
16मन को लगा दे पितु हरि को भुला दे॥ 1562॥
17पाँच इन्द्रियों का पाँच गोविंद राधे।
18विषय जगत पाँच भूत का बता दे॥ 1563॥
19ब्रह्मा ने इन्द्रियों की गोविंद राधे।
20बहिर्मुखी वृत्ति ही बनाया बता दे॥ 1564॥
21याते सब इन्द्रियाँ तो गोविंद राधे।
22शब्दादि ओर ही भागें बता दे॥ 1565॥
23जीव तो चह दिव्य गोविंद राधे।
24कृष्ण शब्द स्पर्श रूप आदि को बता दे॥ 1566॥