Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संसार · पृष्ठ 134
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1जग में लगाया मन गोविंद राधे।
2दुःख पाया अब मन हरि में लगा दे॥ 1519॥
3हरि तो हैं सुखसिन्धु गोविंद राधे।
4मन को लगाओ सुख पाओ बता दे॥ 1520॥
5जग में लगा है मन गोविंद राधे।
6हरि में लगाना है भेद बता दे॥ 1521॥
7जग में लगा है मन गोविंद राधे।
8कारण अनादि अज्ञान बता दे॥ 1522॥
9जग में लगा है मन गोविंद राधे।
10जग प्रत्यक्ष सुखाभास दिला दे॥ 1523॥
11जग सुख भक्ति तजु गोविंद राधे।
12हरि सुख भक्ति करु हरि ते मिला दे॥ 1524॥
13दूध भी तरल तत्त्व गोविंद राधे।
14जल भी तरल किंतु नवनीत ना दे॥ 1525॥
15दूध सम हरि सुख गोविंद राधे।
16जल सम जग सुख श्याम सुख ना दे॥ 1526॥
17जीव है अनादि भूखा गोविंद राधे।
18अँगुठा पिये भूख जाये ना बता दे॥ 1527॥
19हरि गुरु शरण में गोविंद राधे।
20साँचो नित्य दिव्य सुख मिलेगा बता दे॥ 1528॥
21जग का बड़ा सुख गोविंद राधे।
22जाग्रत स्वप्न सन्धि बेला है बता दे॥ 1529॥
23सर्व शक्तियुत भूप गोविंद राधे।
24सर्वश्रेष्ठ नर आनन्द बता दे॥ 1530॥