Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संसार · पृष्ठ 133
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1धन आदि मद हित गोविंद राधे।
2अपने ते ऊपर देखो बता दे॥ 1507॥
3सोचो यह हरि का गोविंद राधे।
4अगणित ब्रह्माण्ड विश्व बता दे॥ 1508॥
5उस विश्व में है एक गोविंद राधे।
6चतुर्मुखी ब्रह्मा ब्रह्माण्ड बता दे॥ 1509॥
7उस ब्रह्माण्ड में तो गोविंद राधे।
8अरबों आकाश गंगा हैं बता दे॥ 1510॥
9एक आकाश गंगा गोविंद राधे।
10भीतर हैं अरबों सूर्य बता दे॥ 1511॥
11आकाश गंगा में तो गोविंद राधे।
12सूर्य लगें जैसे राई बता दे॥ 1512॥
13सूर्य मण्डल में तो गोविंद राधे।
14यह पृथ्वी जैसे राई बता दे॥ 1513॥
15ऐसी हरि सत्ता के गोविंद राधे।
16आगे तुम्हारी सत्ता क्या बता दे॥ 1514॥
17जो कछु है भी गोविंद राधे।
18सब है नश्वर रूप बता दे॥ 1515॥
19याते हरि शरण जा गोविंद राधे।
20सब अभिमान निर्मूल नसा दे॥ 1516॥
21धनी का तो धन मद गोविंद राधे।
22दरिद्रता ही दूर करती बता दे॥ 1517॥
23जग का जो दुःख मिले गोविंद राधे।
24सोई दुःख वाते हरि भजन करा दे॥ 1518॥