Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संसार · पृष्ठ 132
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1जग का भी दुःख मिले गोविंद राधे।
2हरिहूँ न भजे महापापी बता दे॥ 1495॥
3संसारी वैभव गोविंद राधे।
4मदवर्धक हरि विमुख करा दे॥ 1496॥
5जग वैभव ऐसा गोविंद राधे।
6प्रज्ञा चक्षुओं को भी अन्धा बना दे॥ 1497॥
7जग वैभव ऐसा गोविंद राधे।
8सुग्रीव जैसा ज्ञानी राम को भुला दे॥ 1498॥
9प्रभुता का मद ऐसा गोविंद राधे।
10बड़े बड़े ज्ञानी को बधिर बना दे॥ 1499॥
11प्रभुता हो मूर्खता हो गोविंद राधे।
12यौवन धन भी हो गर्त में गिरा दे॥ 1500॥
13धन की हैं तीन गति गोविंद राधे।
14दान उपभोग अरु नाश बता दे॥ 1501॥
15धन का है मद ऐसा गोविंद राधे।
16बड़े बड़े ज्ञानी को अन्धा बना दे॥ 1502॥
17अधिक धन होने ते गोविंद राधे।
18पन्द्रह अनर्थ उत्पन्न हों बता दे॥ 1503॥
19दम्भ, काम, क्रोध, गर्व गोविंद राधे।
20हिंसा अरु चोरी, झूठ बोलना बता दे॥ 1504॥
21अहंकार भेद-बुद्धि गोविंद राधे।
22बैर अनीति लम्पटता बता दे॥ 1505॥
23जुआ स्पर्धा शराब गोविंद राधे।
24पन्द्रह अनर्थ पूर्ण पतन करा दे॥ 1506॥