Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संसार · पृष्ठ 131
Reading 143 of 516 · Source nos. 1483–1494 · Source PDF 148
1दाता हरि गुरु दो हैं गोविंद राधे।
2और सब जग है भिखारी तोहिं का दे॥ 1483॥
3सब चाहें निज सुख गोविंद राधे।
4याते खटपट रात दिन हो बता दे॥ 1484॥
5काऊ को न दोष कछु गोविंद राधे।
6सुख का स्वभाव सब ही का बता दे॥ 1485॥
7जग में न मानो सुख गोविंद राधे।
8अन्यथा वियोग में हो दुःख बता दे॥ 1486॥
9जग में न सुख, यदि गोविंद राधे।
10मान ले तो दुख नहिं मिलेगा बता दे॥ 1487॥
11मिलन में सुख ना हो गोविंद राधे।
12विरह में दुख ना हो मन यों बना दे॥ 1488॥
13पंच प्रपंच ऐसा गोविंद राधे।
14हरि गुरुअनुकम्पा पाके भी गवाँ दे॥ 1489॥
15भूल भुलैया जग गोविंद राधे।
16ज्ञानाभिमानी भी ज्ञान भुला दे॥ 1490॥
17भूल भुलैया जग गोविंद राधे।
18जो भी आया आपु अरु बाप को भुला दे॥ 1491॥
19है है, ना है ना है गोविंद राधे।
20है ना है, ना है है, हैं चार बता दे॥ 1492॥
21जग वैभव भी हो गोविंद राधे।
22मद भी न होय दुसम्भव बता दे॥ 1493॥
23जग वैभव भी हो गोविंद राधे।
24हरि भक्त भी हो योगभ्रष्ट बता दे॥ 1494॥