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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

संसार · पृष्ठ 130

Reading 142 of 516 · Source nos. 1471–1482 · Source PDF 147

1वासनासक्त जीव गोविंद राधे।

2विषय आधीन गीध ज्यों बता दे॥ 1471॥

3जग में न सुख दुख गोविंद राधे।

4मन की आसक्ति सुख दुःख दिला दे॥ 1472॥

5जग का है सुख ऐसा गोविंद राधे।

6शिशु पिये अँगुठा ज्यों धोखा बता दे॥ 1473॥

7जग सुख ऐसा जैसे गोविंद राधे।

8मृगजल हित मृग प्राण गवाँ दे॥ 1474॥

9जग मृगजल ज्यों गोविंद राधे।

10प्यास मिटाये ना प्यास बढ़ा दे॥ 1475॥

11जग फूल सेमर गोविंद राधे।

12सुवा चोंच मारे कछु पाये ना बता दे॥ 1476॥

13जग सुख दुःख ही है गोविंद राधे।

14दिव्य दुःख सुख ही है मरम बता दे॥ 1477॥

15जग में है सब कछु गोविंद राधे।

16सुख ही नहीं है काहे कोई बता दे॥ 1478॥

17जग में है व्याप्त ब्रह्म गोविंद राधे।

18वही सुख है नेत्र दिव्य तो बना दे॥ 1479॥

19जग ते न माँगो सुख गोविंद राधे।

20जग में न सुख तोहिं जग सुख का दे॥ 1480॥

21सुख का भिखारी तो है गोविंद राधे।

22सारा संसार पुनि तोहिं सुख का दे॥ 1481॥

23तू जासों माँगे सुख गोविंद राधे।

24वो भी तोसों माँगे सुख तोहिं सुख का दे॥ 1482॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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