Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संसार · पृष्ठ 125
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1“एको ह वै नारायण” गोविंद राधे।
2मंत्र जग स्रष्टा हरि को बता दे॥ 1411॥
3“ईक्षतेर्नाशब्दम्” गोविंद राधे।
4ब्रह्म सूत्र कह हरि स्रष्टा बता दे॥ 1412॥
5हरि सदसत्रूपा गोविंद राधे।
6गुणमयी माया ते विश्व बना दे॥ 1413॥
7जग को बना के हरि गोविंद राधे।
8व्याप्त हो रहे निर्लेप बता दे॥ 1414॥
9मायावादी कह गोविंद राधे।
10जग का मूल कारण प्रकृति बता दे॥ 1415॥
11पुनि कह प्रकृति है गोविंद राधे।
12स्वयं ही परिणामशीला बता दे॥ 1416॥
13प्रकृति निमित्त अरु गोविंद राधे।
14उपादान दोनों कारण बता दे॥ 1417॥
15किन्तु प्रकृति जड़ गोविंद राधे।
16परिणामशीला भी नहीं है बता दे॥ 1418॥
17यदि हम मान भी लें गोविंद राधे।
18प्रकृति को परिणामशीला बता दे॥ 1419॥
19पुनि क्यों प्रकृति की गोविंद राधे।
20प्रलय में साम्यावस्था बता दे॥ 1420॥
21संकल्प ते ही गोविंद राधे।
22सृष्टि या प्रलय हो नित्य बता दे॥ 1421॥
23विवर्तवादी कह गोविंद राधे।
24जग तो है ही नहीं भ्रान्ति है बता दे॥ 1422॥