Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संसार · पृष्ठ 120
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1भावार्थ तप तप गोविंद राधे।
2ऐसा सुना दो बार बता दे॥ 1351॥
3किसने कहा तप गोविंद राधे।
4देखा चारों ओर बता दे॥ 1352॥
5दीखा न कोई जब गोविंद राधे।
6बैठे पुनि निज कमल बता दे॥ 1353॥
7करने लगे तप गोविंद राधे।
8ब्रह्मा जी मनोयोग ते बता दे॥ 1354॥
9तप किया ब्रह्मा ने गोविंद राधे।
10देव वर्ष एक सहस्र बता दे॥ 1355॥
11कृष्ण प्रसन्न हुये गोविंद राधे।
12उन्होंने दिखाया निज धाम बता दे॥ 1356॥
13वह हरि धाम तो गोविंद राधे।
14धामों में है सर्वश्रेष्ठ बता दे॥ 1357॥
15उस दिव्य धाम में गोविंद राधे।
16काल कर्म माया जाये ना बता दे॥ 1358॥
17वहाँ नहिं माया के गोविंद राधे।
18सत्व रज तम तीनों गुण भी बता दे॥ 1359॥
19वहाँ तो निवास करें गोविंद राधे।
20हरि के नित्य पार्षद ही बता दे॥ 1360॥
21हरि का शरीर वहाँ गोविंद राधे।
22दिव्य तेज युक्त श्याम रंग का बता दे॥ 1361॥
23कमल नेत्र पीतपट गोविंद राधे।
24रोम रोम रस सौन्दर्य बता दे॥ 1362॥