Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
शरणागति, कृपा · पृष्ठ 106
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1एक है काल तुष्टि गोविंद राधे।
2समय जब आये तो साधन करा दे॥ 1207॥
3एक है भाग्य तुष्टि गोविंद राधे।
4भाग्य अपने आप साधन करा दे॥ 1208॥
5भोग में रोग भय गोविंद राधे।
6योग में वियोग का भय है बता दे॥ 1209॥
7बल में हो शत्रु भय गोविंद राधे।
8रूप में बुढ़ापे का भय है बता दे॥ 1210॥
9धन में तो खल भय गोविंद राधे।
10तन में यमराज का भय है बता दे॥ 1211॥
11जग में सर्वत्र भय गोविंद राधे।
12हरि की भक्ति ही निर्भय बता दे॥ 1212॥
13भुक्ति मुक्ति भक्ति का है गोविंद राधे।
14कारण मन यह बुद्धि को बता दे॥ 1213॥
15करना नहीं है कछु गोविंद राधे।
16मन ते मनन करि मन को लगा दे॥ 1214॥
17हरि माँगे मन तेरा गोविंद राधे।
18मन ते हरि सुमिरन करवा दे॥ 1215॥
19जग में भी सुना होगा गोविंद राधे।
20मन यार में तन कार में लगा दे॥ 1216॥
21मन एक क्षेत्र दो हैं गोविंद राधे।
22जग में लगा दे चाहे हरि में लगा दे॥ 1217॥
23तन चाहे जग, दे दो गोविंद राधे।
24मन चाहे हरि, दे दो काम बना दे॥ 1218॥