Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
शरणागति, कृपा · पृष्ठ 105
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1राम का क्रोध देखो गोविंद राधे।
2रावण को मारि साकेत दिला दे॥ 1195॥
3कुसुमहुँ कोमल गोविंद राधे।
4असुरन बधि निज पग में मिला दे॥ 1196॥
5शिशुपाल आदि को भी गोविंद राधे।
6मारि हरि माया ते मुक्त करा दे॥ 1197॥
7कृपा का अभाव हेतु गोविंद राधे।
8प्रथम कपूयाचरण बता दे॥ 1198॥
9कपूयाचरण तीन गोविंद राधे।
10जिह्म अनृत मायाभाव बता दे॥ 1199॥
11जिह्म भाव परिभाषा गोविंद राधे।
12मन में हो विविध कुटिलता बता दे॥ 1200॥
13अनृत भाव परिभाषा गोविंद राधे।
14अच्छा कहलाने का यत्न बता दे॥ 1201॥
15मायाभाव परिभाषा गोविंद राधे।
16लोकरंजन का ही लक्ष्य बता दे॥ 1202॥
17कृपा का अभाव हेतु गोविंद राधे।
18दूजो आध्यात्मिक तुष्टि बता दे॥ 1203॥
19आध्यात्मिक तुष्टि चार गोविंद राधे।
20क्रम ते उनकी परिभाषा बता दे॥ 1204॥
21एक भगवत् तुष्टि गोविंद राधे।
22हरि की कृपा हो तो साधना करा दे॥ 1205॥
23शरण वरण तुष्टि गोविंद राधे।
24शरणागति शाब्दिक ही हो बता दे॥ 1206॥