Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
शरणागति, कृपा · पृष्ठ 104
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1कुन्ती ने वर माँगा गोविंद राधे।
2मोहिं दुख ही दुख दे सुख ना दे॥ 1183॥
3सूर्य का स्वभाव जैसे गोविंद राधे।
4जगत को देना प्रकाश बता दे॥ 1184॥
5हरि गुरु का स्वभाव गोविंद राधे।
6कारण बिनु कृपा करना बता दे॥ 1185॥
7हरि गुरु कृपा मर्म गोविंद राधे।
8अज्ञानी जीव नहिं जाने बता दे॥ 1186॥
9किसी को संसार गोविंद राधे।
10देना ही हरि गुरु कृपा है बता दे॥ 1187॥
11किसी का संसार गोविंद राधे।
12छीनना ही हरि गुरु कृपा है बता दे॥ 1188॥
13जाको जग दे हरि गोविंद राधे।
14वाको शक्ति दै के निर्लेप बना दे॥ 1189॥
15माँ निज सुत हित गोविंद राधे।
16कभू चूमे चिपटाये प्यार दे बता दे॥ 1190॥
17माँ निज सुत हित गोविंद राधे।
18कभू डाँटे और रु लाये बता दे॥ 1191॥
19रोग में निरादर में गोविंद राधे।
20धन नाश में है कृपा हरि की बता दे॥ 1192॥
21स्वजन वियोग में गोविंद राधे।
22प्रिय मृत्यु में है कृपा हरि की बता दे॥ 1193॥
23वस्तुतस्तु हरि गुरु गोविंद राधे।
24कृपा के सिवा कछु करें ना बता दे॥ 1194॥