Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
शरणागति, कृपा · पृष्ठ 102
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1भक्त को भी भाग्य भोग्य गोविंद राधे।
2संचित क्षम्य क्रियमाण फल ना दे॥ 1159॥
3मामा कृष्ण पिता अर्जुन गोविंद राधे।
4अभिमन्यु मरा भाग्य भोग्य बता दे॥ 1160॥
5कर्म में स्वतंत्र जीव गोविंद राधे।
6ऐसा वेद शास्त्र बताता है बता दे॥ 1161॥
7कर्म में स्वतंत्र सब गोविंद राधे।
8फल भोगने में परतंत्र बता दे॥ 1162॥
9मकड़ी के जाल जनु गोविंद राधे।
10जग में फँसाया आपु काउ दोष का दे॥ 1163॥
11शुभाशुभ कर्मों द्वारा गोविंद राधे।
12बाँधा आपु आपु को हरिहिं दोष का दे॥ 1164॥
13लालन कृपा ही है गोविंद राधे।
14ताड़न भी कृपा फल दिव्य बता दे॥ 1165॥
15प्रथम तो हीरे को गोविंद राधे।
16खोदा काटा घिसा हीरा रोया बता दे॥ 1166॥
17वही हीरा जब बना गोविंद राधे।
18हरि के गले का हार धन्य बता दे॥ 1167॥
19शिशु को नहलाये माँ गोविंद राधे।
20शिशु रोये किन्तु हो स्वस्थ बता दे॥ 1168॥
21पुत्रवत्सला माँ ज्यों गोविंद राधे।
22भूखे सुत को नींद ते जगा दे॥ 1169॥
23ऐसे श्री कृष्ण ने भी गोविंद राधे।
24प्रलय के पश्चात् सृष्टि की बता दे॥ 1170॥