Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
शरणागति, कृपा · पृष्ठ 101
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1माया को कौन तरे गोविंद राधे।
2जो जग आसक्ति त्याग दे बता दे॥ 1147॥
3आत्मा अकेली न गोविंद राधे।
4कर्ता कहाती सब को बता दे॥ 1148॥
5आत्मा है कर्ता सँग गोविंद राधे।
6शरीरेन्द्रिय चेष्टा दैव बता दे॥ 1149॥
7प्रकृति तो जड़ है गोविंद राधे।
8यह कैसे हो कर्ता बता दे॥ 1150॥
9सुकृत या दुष्कृत गोविंद राधे।
10भाग्य हरि काल न कराता बता दे॥ 1151॥
11कर्म शक्ति दाता हरि गोविंद राधे।
12याते हरि को कर्म कर्ता बता दे॥ 1152॥
13कर्म शक्ति मात्र दे गोविंद राधे।
14कर्मों में स्वतंत्र सब जीवों को बना दे॥ 1153॥
15कर्म तो है जड़ याते गोविंद राधे।
16हरि ही है कर्म फल दाता बता दे॥ 1154॥
17जीव तो है अल्पज्ञ गोविंद राधे।
18याते कर्म फल दाता हरि हैं बता दे॥ 1155॥
19हरि ही करावें कर्म गोविंद राधे।
20तो वेद व्यर्थ सिद्ध होंगे बता दे॥ 1156॥
21हरि ही करावें कर्म गोविंद राधे।
22तो जीव फल काहे भोगे बता दे॥ 1157॥
23हरि ही करावें कर्म गोविंद राधे।
24वह कर्म सिद्ध भक्तों का बता दे॥ 1158॥