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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

शरणागति, कृपा · पृष्ठ 100

Reading 112 of 516 · Source nos. 1135–1146 · Source PDF 117

1माना मैं महापापी गोविंद राधे।

2अचरज कौन यामें सोचि के बता दे॥ 1135॥

3कहे तो तू महापापी गोविंद राधे।

4माने क्यों न अचरज यों उर ला दे॥ 1136॥

5मैं तो मानूँ पापी किन्तु गोविंद राधे।

6तेरी माया मेरे मन को बहका दे॥ 1137॥

7अब न बनाऊँगा गोविंद राधे।

8अपना किसी को किन्तु माया भुला दे॥ 1138॥

9उर में बिठा दे हरि गोविंद राधे।

10माया का बिस्तर गोल करा दे॥ 1139॥

11ब्रह्म पुत्र जीव आगे गोविंद राधे।

12मन जड़ माया को हउवा बता दे॥ 1140॥

13तू तो मायापति सुत गोविंद राधे।

14माया ते न डर उठ माया को डरा दे॥ 1141॥

15माया जो डरावे तोहिं गोविंद राधे।

16माया पति नाम लै के माया को डरा दे॥ 1142॥

17माया की बिसात क्या है गोविंद राधे।

18राधे राधे गाके मायापति को डरा दे॥ 1143॥

19माया बहकावे जो तो गोविंद राधे।

20गुरु बुद्धि ते मन को समझा दे॥ 1144॥

21माया ते न डरु लरु गोविंद राधे।

22गुरु शक्ति ते माया शक्ति को हरा दे॥ 1145॥

23माया को कौन तरे गोविंद राधे।

24जो शरण्य गुरु नित सेवे बता दे॥ 1146॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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