Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
शरणागति, कृपा · पृष्ठ 99
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1श्याम की ही दासी माया गोविंद राधे।
2श्याम जब चाहें तब माया भगा दें॥ 1123॥
3माया तो बँदरिया है गोविंद राधे।
4श्याम तो हैं नट जैसा चाहें नचा दें॥ 1124॥
5माया ते न डरो कोउ गोविंद राधे।
6माया पति उर में हैं माया को दिखा दे॥ 1125॥
7माया को बुरा न कहो गोविंद राधे।
8माया दुःख दै के मायापति ते मिला दे॥ 1126॥
9जीव तो तटस्था शक्ति गोविंद राधे।
10माया बहिरंगा ज्ञान जीव का भुला दे॥ 1127॥
11ब्रह्म को भुलाया याते गोविंद राधे।
12माया ने फँसाया मायापति को बुला दे॥ 1128॥
13हरि है मायाधीश गोविंद राधे।
14जीव मायाधीन हरि माया हटा दे॥ 1129॥
15जीव दास माया दासी गोविंद राधे।
16हरि शक्ति पाके दासी दास को हरा दे॥ 1130॥
17जीव को नचावे माया गोविंद राधे।
18हरि को नचावे योगमाया बता दे॥ 1131॥
19जीव तो हो माया मुक्त गोविंद राधे।
20हरि योगमाया मुक्त हों ना बता दे॥ 1132॥
21जैसे जलयान खग गोविंद राधे।
22उड़ि थकि जलयान आवे बता दे॥ 1133॥
23जीव जग सुख नहिं गोविंद राधे।
24पावे तब आवे हरि शरण बता दे॥ 1134॥