Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
शरणागति, कृपा · पृष्ठ 97
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1मन बड़ा चंचल गोविंद राधे।
2छिन स्वर्ग छिन पाताल पठा दे॥ 1099॥
3मन का भरोसा नहिं गोविंद राधे।
4विश्वामित्र पराशर को भी धोखा दे॥ 1100॥
5मन का भरोसा नहिं गोविंद राधे।
6योगीश्वरों को भी सिद्धि में लुभा दे॥ 1101॥
7मन का भरोसा नहिं गोविंद राधे।
8सुर नर मुनि सब को बहका दे॥ 1102॥
9मन का भरोसा नहिं गोविंद राधे।
10हरि हरिजन तजि सब को नचा दे॥ 1103॥
11मन मनमानी करे गोविंद राधे।
12लख चौरासी योनि डर ते डरा दे॥ 1104॥
13माया सुत मन करे गोविंद राधे।
14पाप, फल भोगे हरि सुत क्यों बता दे॥ 1105॥
15जीव मन दोनों मिलि गोविंद राधे।
16कर्ता हैं मन नहिं इकलो बता दे॥ 1106॥
17माया सत्य ब्रह्म शक्ति गोविंद राधे।
18कोई भी उपाधि नहिं ग्राह्य बता दे॥ 1107॥
19माया जीव सत्य शक्ति गोविंद राधे।
20ब्रह्म शक्तिमान यह ज्ञान करा दे॥ 1108॥
21क्षेत्र अरु क्षेत्रज्ञ गोविंद राधे।
22अपरा परा क्षर अक्षर बता दे॥ 1109॥
23माया शक्ति जड़ गोविंद राधे।
24जीव शक्ति तो चैतन्य बता दे॥ 1110॥