Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
शरणागति, कृपा · पृष्ठ 96
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1मन का ही कर्म कर्म गोविंद राधे।
2याते रैन दिन मन हरि में लगा दे॥ 1087॥
3हरि में या जग में ही गोविंद राधे।
4एक काल एक ही स्मरण हो बता दे॥ 1088॥
5तनु ते हीे सुता का गोविंद राधे।
6तनु ते ही कान्ता मिलन बता दे॥ 1089॥
7याते तनु कर्म व्यर्थ गोविंद राधे।
8मन का ही कर्म है कर्म बता दे॥ 1090॥
9तनु डूबे यमुना में गोविंद राधे।
10मन डूबे जग, शुद्ध क्यों हो बता दे॥ 1091॥
11तन का नमन धोखा गोविंद राधे।
12मन का नमन ही नमन बता दे॥ 1092॥
13तन ते जगत कर्म गोविंद राधे।
14मन ते भजन कर्मयोग सिखा दे॥ 1093॥
15शरण कृपा के बीच गोविंद राधे।
16झगड़ा पड़ा है बड़ा झगड़ा मिटा दे॥ 1094॥
17प्रथम शरण गहु गोविंद राधे।
18हरि कह, जीव कह प्रथम कृपा दे॥ 1095॥
19अधिकारी पे कृपा करे गोविंद राधे।
20इसको जग वाले व्यापार बता दें॥ 1096॥
21मन हठ नहिं छोड़े गोविंद राधे।
22शरण न जाय चाहे जितनी सजा दे॥ 1097॥
23भजन करे न मन गोविंद राधे।
24करूँगो करूँगो कहि पाठ पढ़ा दे॥ 1098॥