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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

शरणागति, कृपा · पृष्ठ 95

Reading 107 of 516 · Source nos. 1075–1086 · Source PDF 112

1आत्मा सूक्ष्म मन सूक्ष्म गोविंद राधे।

2आत्मा में मन अध्यस्त बता दे॥ 1075॥

3एक क्षण को भी कोई गोविंद राधे।

4रहे न अकर्मा सन्यासी को बता दे॥ 1076॥

5सुषुप्ति में भी कर्म गोविंद राधे।

6कारण शरीर की अविद्या बता दे॥ 1077॥

7अविद्या मनोगत तो गोविंद राधे।

8सुषुप्ति में भी कैसे रहती बता दे॥ 1078॥

9कोई अकर्मा नहिं गोविंद राधे।

10श्वास लेना भी तो कर्म है बता दे॥ 1079॥

11यदि मन हरि में हो गोविंद राधे।

12तन करे कर्म अक र्ता बता दे॥ 1080॥

13यदि मन हरि में हो गोविंद राधे।

14तन ते किया कर्म कछु फल ना दे॥ 1081॥

15आत्मा अकर्ता है गोविंद राधे।

16इन्द्रियाँ अकर्ता मन कर्ता बता दे॥ 1082॥

17मन के अधीन इन्द्रिय गोविंद राधे।

18याते इन्द्रियों को भी हरि में लगा दे॥ 1083॥

19इन्द्रियों की भक्ति ऐसी गोविंद राधे।

20कछु ना ते कछु कछु अच्छा है बता दे॥ 1084॥

21तन नहिं मन देखे गोविंद राधे।

22कमला सा प्यार कुबरी को दिला दे॥ 1085॥

23तन ते भजन किया गोविंद राधे।

24प्यारा तो प्यार माँगे मन का बता दे॥ 1086॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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