Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
शरणागति, कृपा · पृष्ठ 94
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1आँख मोतिया बिन्द गोविंद राधे।
2सूर्य के प्रकाश को मूढ़ दोष का दे॥ 1063॥
3हरि मन दोनों हठी गोविंद राधे।
4हरि माँगे मन मन माँगे कृपा दे॥ 1064॥
5मन का ही दोष नहिं गोविंद राधे।
6बुद्धि की मिली भगत मन ते बता दे॥ 1065॥
7मन दे दे बुद्धि दे दे गोविंद राधे।
8यही है प्रपन्न परिभाषा बता दे॥ 1066॥
9ज्ञानी करे बुद्धि दान गोविंद राधे।
10भक्त मन ही दे दोनों भोले बता दे॥ 1067॥
11बुद्धि मात्र दान ते तो गोविंद राधे।
12मन में वासना भर जायेगी बता दे॥ 1068॥
13मन मात्र दान ते तो गोविंद राधे।
14बुद्धि संसार में लगेगी बता दे॥ 1069॥
15मन का ही रूप बुद्धि गोविंद राधे।
16एक नाम अन्तःकरण बता दे॥ 1070॥
17मन बुद्धि मानो यदि गोविंद राधे।
18दो, बुद्धि आधीन मन को बता दे॥ 1071॥
19बुद्धि है सारथी गोविंद राधे।
20मन रस्सी इन्द्रियाँ घोड़े बता दे॥ 1072॥
21जीव है रथी यात्री गोविंद राधे।
22सारथी जहाँ चाहे रथ को घुमा दे॥ 1073॥
23मन बुद्धि चित्त अहं गोविंद राधे।
24चारों हैं मन के ही रूप बता दे॥ 1074॥