Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
शरणागति, कृपा · पृष्ठ 93
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1मायिक मन दै के गोविंद राधे।
2दिव्य प्रेम लूटो दोनों हैं सीधे सादे॥ 1051॥
3सब कछु हरि का है गोविंद राधे।
4हरि को ही दे दे कहु प्रेम सुधा दे॥ 1052॥
5थोड़ा थोड़ा काहे दिया गोविंद राधे।
6प्यार किया है तो सब कछु लुटा दे॥ 1053॥
7थोड़ा देगा हरि को तो गोविंद राधे।
8हरि देगा थोड़ा तोहिं सब को बता दे॥ 1054॥
9हरि ते भी प्यार तेरा गोविंद राधे।
10“भी” को हटा दे अब “ही” को लगा दे॥ 1055॥
11“तेरे मेरे” बीच हरि गोविंद राधे।
12“भी” तो लगावें सब “ही” ना लगा दे॥ 1056॥
13तू भी मेरा सब मानें गोविंद राधे।
14तू ही मेरा माने कोई बिरला बता दे॥ 1057॥
15बार बार सोचो मन गोविंद राधे।
16मैं हूँ जीव मेरे हरि ही हैं बता दे॥ 1058॥
17हरि बिनु जीव ऐसा गोविंद राधे।
18जल बिनु जैसा हो जलद बता दे॥ 1059॥
19शरण गये बिनु गोविंद राधे।
20कृपा शक्ति कृपा ना दे कृपा ना दे ना दे॥ 1060॥
21हिम गिरि ढिग ना जा गोविंद राधे।
22सूर्य ढिग जा सूर्य शीत भगा दे॥ 1061॥
23तम सन्मुख तू है गोविंद राधे।
24सूर्य सन्मुख हो जा तम को भगा दे॥ 1062॥