Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
शरणागति, कृपा · पृष्ठ 90
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1बुद्धि का अभिमान गोविंद राधे।
2बड़ों बड़ों का भी पतन करा दे॥ 1015॥
3हरि भक्ति नौका पै गोविंद राधे।
4बैठ जा पतवार हरि को थमा दे॥ 1016॥
5हरि यदि थामे ना तो गोविंद राधे।
6पतवार गुरुदेव कर में थमा दे॥ 1017॥
7हरि गुरु मन माँगें गोविंद राधे।
8मायिक मन लै दिव्य बना दें॥ 1018॥
9दाता होके माँगे हरि गोविंद राधे।
10तन मन दे दे हरि दिव्य बना दे॥ 1019॥
11तन मन धन खोया गोविंद राधे।
12जगत में सोच तो जग तोहिं का दे॥ 1020॥
13निर्बल के बल गोविंद राधे।
14शरण ग्रहण करु बल को भुला दे॥ 1021॥
15हरि परखत नित गोविंद राधे।
16जाने कब जीव मन मुझमें लगा दे॥ 1022॥
17हरि हैं समदर्शी गोविंद राधे।
18किसी के मित्र या शत्रु ना बता दे॥ 1023॥
19शरणागत हित गोविंद राधे।
20योग क्षेम वहन कर्ता हरि हैं बता दे॥ 1024॥
21एक बार गालव मुनि गोविंद राधे।
22दे रहे सूर्य को अर्घ्य बता दे॥ 1025॥
23आकाश मार्ग ते गोविंद राधे।
24चित्रसेन ने पीक थूका बता दे॥ 1026॥