Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
शरणागति, कृपा · पृष्ठ 89
Reading 101 of 516 · Source nos. 1003–1014 · Source PDF 106
1हरि भक्त ऊपर गोविंद राधे।
2होती विशेष कृपा हरि की बता दे॥ 1003॥
3कृपा पात्र बनने को गोविंद राधे।
4तन मन धन अर्पन करवा दे॥ 1004॥
5आत्मसमर्पण अर्थ गोविंद राधे।
6निज मन प्राण आदि दान है बता दे॥ 1005॥
7जितनी प्रपत्ति होगी गोविंद राधे।
8उतनी कृपा भी होगी हरि की बता दे॥ 1006॥
9जितनी प्रपत्ति होगी गोविंद राधे।
10उतनी सँभार करें हरि भी बता दे॥ 1007॥
11जितना जो प्यार करे गोविंद राधे।
12उतना ही प्यार करें श्याम भी बता दे॥ 1008॥
13जीव जोेइ नाता जोरे गोविंद राधे।
14श्याम भी सोई नाता जोरें बता दे॥ 1009॥
15पूर्ण प्रपन्न हो जा गोविंद राधे।
16बन जा पतंग डोरी हरि को थमा दे॥ 1010॥
17हरि के प्रपन्न हो जा गोविंद राधे।
18मन शुद्ध करि दिव्य कर ले बता दे॥ 1011॥
19पुनि इस जग में भी गोविंद राधे।
20दसों दिशा में पाये रस ही बता दे॥ 1012॥
21कृष्ण दिव्य रस चाहे गोविंद राधे।
22कृष्ण भक्ति द्वारा मन दिव्य बना दे॥ 1013॥
23संशय तजु मन गोविंद राधे।
24भोला शिशु बनि हो प्रपन्न बता दे॥ 1014॥