Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
शरणागति, कृपा · पृष्ठ 88
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1शरणागत का गोविंद राधे।
2सब पाप हरि हरि ले दाम ना दे॥ 991॥
3शरण में जाये कौन गोविंद राधे।
4तीन तीन देह मेरे मोते छुड़ा दे॥ 992 ॥
5देह का प्रकार चार गोविंद राधे।
6स्थूल, सूक्ष्म, कारण, दिव्य बता दे॥ 993॥
7स्थूल, सूक्ष्म, कारण गोविंद राधे।
8मायिक देह, चौथा दिव्य बता दे॥ 994॥
9स्थूल शरीर को तो गोविंद राधे।
10अन्नमय कोश का बताते हैं बता दे॥ 995॥
11सूक्ष्म शरीर प्राण गोविंद राधे।
12मन विज्ञान तीन कोश का बता दे॥ 996॥
13कारण शरीर तो गोविंद राधे।
14आनन्दमय कोश का है अन्तिम बता दे॥ 997॥
15कारण शरीर संग गोविंद राधे।
16रहे प्रलय में वासनात्मक बता दे॥ 998॥
17भक्तों के हेतु चौथा गोविंद राधे।
18दिव्य है शरीर गोलोक में बता दे॥ 999॥
19स्थूल सूक्ष्म कारण गोविंद राधे।
20तीनों शरीरों का बन्धन बता दे॥ 1000॥
21स्थूल सूक्ष्म कारण गोविंद राधे।
22तनु जब लौं, न स्वतंत्र हो बता दे॥ 1001॥
23हरि प्रिय शत्रु न गोविंद राधे।
24सब पै सामान्य कृपा हो बता दे॥ 1002॥