Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
शरणागति, कृपा · पृष्ठ 87
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1ऐसे ही हरि भी गोविंद राधे।
2प्रपन्न के अपराध पै ध्यान ना दे॥ 979॥
3जो भी हो प्रपन्न वाको गोविंद राधे।
4क्रीत दास बनि सेवें श्याम बता दे॥ 980॥
5भक्त योगक्षेम हरि गोविंद राधे।
6वहन करें भक्त शरण हो बता दे॥ 981॥
7शरण में जाये जो भी गोविंद राधे।
8त्रिगुण त्रिकर्म त्रिताप मिटा दे॥ 982॥
9जो भी हो प्रपन्न वाकी गोविंद राधे।
10जीव माया गुण माया दोनों भगा दे॥ 983॥
11जो भी हो प्रपन्न वाकी गोविंद राधे।
12विद्या अविद्या दोनों माया भगा दे॥ 984॥
13जो भी हो प्रपन्न वाके गोविंद राधे।
14पंचक्लेश पंचकोश भस्म करा दे॥ 985॥
15शरण जाने में घाटा गोविंद राधे।
16मेरा प्यारा पाप पुण्य लै के जला दे॥ 986॥
17हरि सों जो प्रेम करे गोविंद राधे।
18वेद कहे लोक परलोक नसा दे॥ 987॥
19हरि जनि भजु मन गोविंद राधे।
20तेरा सब कछु छीनि भिक्षुक बना दे॥ 988॥
21शरण में जाऊँ यदि गोविंद राधे।
22माया छुड़ा केयोगमाया लगा दे॥ 989॥
23शरण में जाऊँ जो तो गोविंद राधे।
24लख चौरासी खिलौने छिना दे॥ 990॥