Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
शरणागति, कृपा · पृष्ठ 86
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1हरि भक्त लखि माया गोविंद राधे।
2ऐसे भागे जैसे रवि तम को भगा दे॥ 967॥
3हरि को बुला के उर गोविंद राधे।
4माया को नौ दो ग्यारह करा दे॥ 968॥
5हरि उर लखि माया गोविंद राधे।
6सिर पै पैर धरि भाजे बता दे॥ 969॥
7माया ते डरोे जनि गोविंद राधे।
8मायापति शरण ते माया को भगा दे॥ 970॥
9शरणागत का गोविंद राधे।
10आपु बने कर्ता अकर्ता बना दे॥ 971॥
11ब्रह्म कहे तेरा मैं हूँ गोविंद राधे।
12जीव कहे जग मेरा झगड़ा मिटा दे॥ 972॥
13जग में लगाओ बुद्धि गोविंद राधे।
14याते हो जग ते विराग बता दे॥ 973॥
15हरि में लगाओ मन गोविंद राधे।
16बुद्धि को हरि की शरण बता दे॥ 974॥
17अब लौं किया जो किया गोविंद राधे।
18जैसे भी हटे किन्तु किन्तु को हटा दे॥ 975॥
19किन्तु जब हट जाये गोविंद राधे।
20झट पट हठी मन हरि में लगा दे॥ 976॥
21जो भी हो प्रपन्न वाकी गोविंद राधे।
22आपु हरि भक्ति करें गीता बता दे॥ 977॥
23गर्भस्थ शिशु ज्यों गोविंद राधे।
24निज लात मारै मातु हँसि के भुला दे॥ 978॥