Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
मानव देह · पृष्ठ 83
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1तन क्षणभंगुर गोविंद राधे।
2तजि दे गुमान मन हरि में लगा दे॥ 943॥
3चार दिन चाँदनी है गोविंद राधे।
4पुनि अँधियारी रात मूढ़ ध्यान ना दे॥ 944॥
5कोटि यतन करु गोविंद राधे।
6तन धन धाम तेरा कोई साथ ना दे॥ 945॥
7जग तोहिं छोड़े नहिं गोविंद राधे।
8चाहे और अगनित जनम गमा दे॥ 946॥
9तू तो जग छोड़े नहिं गोविंद राधे।
10काल जब चाहे क्षण में छुड़वा दे॥ 947॥
11काल ते छुड़ाने के गोविंद राधे।
12पूर्व मूढ़! मन को हरि में लगा दे॥ 948॥
13काल ते तो जग काँपे गोविंद राधे।
14देवराज इन्द्र पै भी गाज गिरा दे॥ 949॥
15काल ते तो सब हारे गोविंद राधे।
16जग केविधाता को भी पद ते हटा दे॥ 950॥
17काल केभी काल हरि गोविंद राधे।
18एक दिन काल की भी छुट्टी करा दें॥ 951॥
19सारी में थोड़ी बची गोविंद राधे।
20बची खुची थोड़ी ते सारी बना दे॥ 952॥
21हरि भजु जाने कब गोविंद राधे।
22काल तेरा बिस्तर गोल करा दे॥ 953॥
23बेर न करु भजु गोविंद राधे।
24देर का न अंत कभु होगा बता दे॥ 954॥