Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
मानव देह · पृष्ठ 80
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1हरि मन लाये नहिं गोविंद राधे।
2केहि बल पै इतराय बता दे॥ 907॥
3निज सब बल तजु गोविंद राधे।
4निर्बल बनि बल हरि को बना दे॥ 908॥
5तन यौवन धन गोविंद राधे।
6चार दिन की है सब चाँदनी बता दे॥ 909॥
7जो आया जाये वह गोविंद राधे।
8केहि लगि तू धन धाम सजा दे॥ 910॥
9बड़े बड़े आये गये गोविंद राधे।
10तन धन आदि अभिमान मिटा दे॥ 911॥
11धन में कुबेर नहिं गोविंद राधे।
12पुनि धन का अभिमान क्यों बता दे॥ 912॥
13मान ना गणेश सम गोविंद राधे।
14पुनि मान का है अभिमान क्यों बता दे॥ 913॥
15वैभव इन्द्र का ना गोविंद राधे।
16पुनि वैभव का है मद क्यों बता दे॥ 914॥
17रूप काम सा नहिं गोविंद राधे।
18पुनि रूप का है अभिमान क्यों बता दे॥ 915॥
19बुद्धि शारदा सी ना गोविंद राधे।
20पुनि बुद्धि का अभिमान क्यों बता दे॥ 916॥
21प्रभुता न विधि सम गोविंद राधे।
22पुनि प्रभुता का हैे मद क्यों बता दे॥ 917॥
23नृत्य उर्वशी सा ना गोविंद राधे।
24पुनि नृत्य का अभिमान क्यों बता दे॥ 918॥