Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
मानव देह · पृष्ठ 79
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1तन तो है माटी का गोविंद राधे।
2एक दिन माटी में माटी मिला दे॥ 895॥
3माटी का पुतला तू गोविंद राधे।
4काल जब चाहे तोहिं माटी बना दे॥ 896॥
5हरि की शरण गहु गोविंद राधे।
6हाय हाय में काहे जनम गँवा दे॥ 897॥
7गर्भ ते न लाया कछु गोविंद राधे।
8संग भी न जाये कछु मन को बता दे॥ 898॥
9मुट्ठी बाँधे आया था तू गोविंद राधे।
10हाथ पसारे जाये मन को बता दे॥ 899॥
11नंगे तनु आया था गोविंद राधे।
12बिनु तनु जाये काल तनु भी छिना दे॥ 900॥
13नंगा तनु संग लाया गोविंद राधे।
14जग वाले तनु को भी आग में जला दें॥ 901॥
15जग छोड़ना ही होगा गोविंद राधे।
16पहले ही छोड़ि मन हरि में लगा दे॥ 902॥
17एक दिन जाना होगा गोविंद राधे।
18ससुराल मन मायके ते हटा दे॥ 903॥
19आया है जो भी जग गोविंद राधे।
20एक दिन जाना है जग ते बता दे॥ 904॥
21जग एक धर्मशाला गोविंद राधे।
22लोग आवें जावें कौन किसका बता दे॥ 905॥
23एक दिन तनु छिने गोविंद राधे।
24याते मूढ़! मन हरि गुरु में लगा दे॥ 906॥